Friday, April 15, 2011

Because i am the wall.................

hey! i know i am the wall,
but plz don't break it
i can live alone, because i want to survive,
and want to stand here forever
never come to protect me,
but plz don't break it.....!

doesn't need it to decorate & paint,
i can adjust with dust
i am ready to fight with weather,
but plz don't break it
look all are breaking their wall,
but no one come to stop them
i promise you, i will give you shadow always
in any condition,
but plz don't break it............!  

Friday, March 4, 2011

क्या मैं कुछ कह सकता हंू ???????

रूको मत जलाओ आशाओं की किरण, और छोड़ो ये दिलासा देना
भोपाल हो जाएगा भोजपाल, और किसानो की हो रही मौत की क्या?

रूको और मत बनाओ योजनाऐं, और छोड़ो ये विकास की बातें करना
भोपाल हो जाएगा भोजपाल, और राज्य में बढ़ रहे भ्रष्टाचारों की क्या?

रूको और देखो कुछ छोटे गरीब बच्चे,भोपाल के सडक़ों पर नंगे घुम रहे है
भोपाल हो जाएगा भोजपाल, और भूख से बिलख रहे उस गरीब का क्या?

रूको मत जलाओ लोगों के दिलों में अपनी चाहत के दिए,
क्योंकि तुम्हारी ही एक फूंक से वो बूझ जाऐगी
फिर भोपाल भोजपाल तो हो जाएगा, पर उसकी याद हमें हमेशा सताऐगी .

Thursday, February 10, 2011

मत हो उदास...................

जिंदगी में हर वक्त, हर पल और हर घड़ी एक नई कहानी शुरु होती रहती है।  कभी हमें उस कहानी के अंदर जाने में डर लगता है या कभी जिंदगी के उस कहानी को हमें पढऩे में बडा मजा आता है।  कैसे होगी अपनी जिंदगी की गुजर-बसर?  ये कभी मत सोचो, हां अगर सोचना ही है तो बस ये सोचो के तुम्हारी जिंदगी में जो हो रहा, क्या वो तुम्हारे लिए अच्छा हो रहा?  जोर इसपर दिया जाना ज्यादा जरुरी होगा के आखिर क्यों जो हो रहा है वो अच्छा नही हो रहा। कहीं न कहीं से विश्वास आगे आता है। जिंदगी को हम अगर विश्वास के साथ जोड़ कर देखें तो शायद वो गलत नही होगा। सारी परिस्थिति का सामना हमें विश्वास के साथ करना चाहिए। हमारा जन्म इस धरती पर जिंदगी को मस्ती के साथ जीने के लिए हुआ है। इसलिए  जीओ जी भर के, मत हो कभी उदास क्योंकि उदासी अपने हौसले को धीरे-धीरे कम कर देती है। समय के साथ-साथ अपने आपको जोडऩे की कोशिश करो, फिर देखना सब कुछ तुम्होरे अनुसार होगा।

Monday, January 31, 2011

न नक्सली और न माओवादी, ये हैं सिर्फ हत्यावादी


मैं यहां यह कहना चाहता हूं कि नक्सल आंदोलन की शुरूआत में जो इसका स्वरूप था उसमें आज काफी बदलाव आ चुका है। इसकी शुरूआत तो हुई थी सामा जिक और आर्थिक कारणों से, क्योंकि उस समय जो पीढ़ी थी उसे लगा था कि हमें आजाद हुए इतने वर्ष हो गए परंतु अभी भी आर्थिक शोषण और सामाजिक असमानता ज्यों की त्यों हैं। सत्ता और सामथ्र्थ कुछ ताकतवर लोगों के हाथों में है, वहीं सब कुछ संचालित कर रहें हैं। जनता शोषित और पीडि़त है, ऐसे माहौल में चारू मजूमदार ने एक चिंगारी सुलगायी थी।

देखिए, ये भी कहना गलत होगा कि हिंसा का तत्व इधर कुछ वर्षो में इस आंदोलन में शानिल हुआ है। हिंसा तो शुरू से उनके आंदोलन का प्रमुख तत्व रही है। इसका केद्रिंय मंत्र ही था- वर्ग शत्रु का अंत करना। जमीनदार, सूदखओर, भ्रष्ट पुलिस अधिकारी आदि इनके निशाने पर रहें हैं। इनकी हत्या ही उनका एकमात्र लक्ष्य रहा है। नक्सली सशस्त्र काँति में विश्वास करतें हैं। मगर आज इस आंदोलन में विचारधारा जैसी चीज नही रही, उदेद्श्यहीन हिंसा प्रभावी हो गई है। विकास कार्य में बाधा डालना, सडक़े-पुल तोडऩा, राष्ट्र विरोधी से सांठ-गांठ करना आज इनके अभियान में शामिल हो गए हैं।

मैं तो यही कहना चाहता हूं कि आज नक्सली आंदोलन पूरी तरह भटक गया है। न कोई आदर्श है, न कोई कानून। ये रेलवे ट्रेक उड़ाते है माओ के नाम पर, थाने उड़ातें हैं लेनिन के नाम पर और लेवी(रंगदजारी) वसूलतें हैं माक्र्स के नाम पर



प्रतीक शेखर

Saturday, January 29, 2011

है अगर दम तुझमें, तो दिखा जलवा जरा..............

हम कहते हैं भारत हमारा देश है। इसे और सजा कर कहा जाए तो हम कह सकते है कि भारत दुनिया का सबसे अच्छा और सबसे प्यारा देश है। चलिए, इसे और प्रभावित तरीके से कहने की कोशिश करते हैं भारत एक कृषि प्रधान और सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। कहीं मैं गलत तो नही कह रहा, शायद हां। क्योंकि भारत की वर्तमान स्थिति कुछ और ही ब्यान करती है, आज हमारा देश भ्रष्टाचार की चपेट में आता जा रहा है, पर उंगला उठाने आगे कोई भी नही आ रहा। सारी बातें सुप्रीमकोर्ट तक आकर खत्म हो जा रही है।


है अगर दम तुझमें, तो दिखा जलवा जरा
छोड़ नफरत की तू आंधी, प्यार का तुफां

भ्रष्ट लोगों को हटा दे, देश के वीर जवां
तेरे सिर पर ही है सजती, देश की किस्मत यहां

देश में करोड़ों रूपए के घोटाले तो ऐसे हो रहें हैं जैसे हमारे देश में मानो अचानक से पैसे के पेड़ उग आऐं हो। देश की जनता अपनी पेट काट-काट कर टैक्स जमा करती है और उस पैसे को कोई यूहीं लूट कर ले जाए हम कैसे देख सकते हैं। परंतु सवाल यह है कि इनके विरूद्ध कौन खड़ा हो, वो जिन्हें देश में हो रही गतिविधियों का कुछ पता नही या फिर वो जिन्हें दिनभर काम करना है और ढ़ेर सारा पैसा कमा कर रात को घर पर आकर सो जाना है। जी नही, ऐसे लोगों से तो उम्मिद भी करना बेवकूफी होगा। अगर ऐसे भ्रष्ट लोगों को वाकई में इनके अंजाम तक पहुंचाना है तो सबसे पहले हमें ही आगे आना पड़ेगा।

प्रतीक शेखर 

 

Friday, January 28, 2011

इस जिंदगी से क्या गिला, जो मिला वो ........

शायद किसी ने सच ही कहा है, जो होता है अच्छे के लिए ही होता है। इसलिए तो मैं कहता हूं कि इस जिंदगी से क्या गिला, जो मिला वो अच्छा था पर अधूरा मिला। अक्सर जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते जाते रहते हैं, कभी खुशी तो कभी गम, कभी प्यार तो कभी नफरत जैसे स्तिथि इसमें हमेशा पैदा होती रहती है। मैं अपनी जिंदगी से थाड़ा दूर खड़ा हूं, पर हां, मैं अपनी जिंदगी से बहुत प्यार करता हूं। इंसान की परिभाषा भला कोई मुझे दे सकता है क्या? या फिर छोडि़ए मुझे सिर्फ कोई इंसानियत की ही परिभाषा बता दे।

Tuesday, January 25, 2011

कौन जाने की कल

तुमसे मिलने को चेहरे बनाना पड़े
क्या दिखायें जो दिल भी दिखाना पड़े,

गम के घर तक न जाने की कोशिश करो
जाने किस मोड़ पर मुसकुराना पड़े,

आग ऐसी लगाने से क्या फायदा
जिसके शोलों को खुद ही बुझाना पड़े,

कल का वादा न लो, कौन जाने की कल
किस को चाहंू, किसे भूल जाना पड़े,

खो न देना कहीं ठोकरों का हिसाब
जाने किस-किस को रास्ता बताना पड़े,

ऐसे बाजार में आये ही क्यों वसीम
अपनी बोली जहां खुद लगाना पड़े।
                    

                                        वसीम बरेलवी

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